धरमजयगढ़। राजस्व तंत्र में जब सख्ती ढीली पड़ती है, तब अनियमितताएँ किस तरह सिर चढ़कर बोलने लगती हैं, इसकी बानगी धरमजयगढ़ क्षेत्र से सामने आई है। यहाँ सरकारी जमीन को फर्जी दस्तावेज़ों के सहारे बेच देने का बड़ा घोटाला उजागर हुआ है। आरोप है कि पटवारी और तीन व्यक्तियों ने मिलीभगत कर शासकीय भूमि को पहले निजी नाम पर दर्ज कराया और बाद में बेच दिया। चौंकाने वाली बात यह है कि इस खेल में पत्थलगांव के व्यवसायी मधुसूदन अग्रवाल, जो पत्थलगांव विधायक गोमती साय के बेहद करीबी माने जाते हैं, का भी नाम सामने आया है। स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या राजनीतिक रसूख के सहारे कार्रवाई को रोका जा रहा है?
जांच में खुलासा — जंगल मद की जमीन को फर्जी तरीके से निजी नाम पर कर दिया गया दर्ज
ग्राम रायमेर की शासकीय भूमि—
- खसरा नंबर 467/23 (0.248 हे.)
- 467/25 (0.965 हे.)
- 467/36 (0.874 हे.)
जो कि बड़े झाड़ के जंगल मद में दर्ज थी, उसे दस्तावेज़ों में हेरफेर कर निजी स्वामित्व में बदल दिया गया।
पहले यह भूमि उजित राम के नाम पर गलत तरीके से दर्ज कर दी गई। इसके बाद उजित राम के नाम से आम मुख्त्यारनामा बनाकर जमीन को कैलाश कुमार जेठवानी के नाम कर दिया गया। जबकि उजित राम ने स्वयं बयान दिया कि वह कैलाश को जानता तक नहीं है।
इसके बाद कैलाश ने यह जमीन पत्थलगांव के व्यवसायी मधुसूदन अग्रवाल को बेच दी।
पटवारी ने भी निभाई बड़ी भूमिका — नक्शा, चतुर्सीमा और बी-वन खसरा तक जारी कर दिया
फर्जी बिक्री को मजबूत दिखाने के लिए पटवारी राकेश साय ने न सिर्फ विक्रय पत्र मान्य कर दिया, बल्कि इसके साथ चतुर्सीमा, बी-वन खसरा और नक्शा तक जारी कर दिया। शिकायत के बाद विभाग में हड़कंप मचा और गोपनीय जांच कराई गई।
जांच रिपोर्ट में साफ कहा गया कि —
- जमीन पूरी तरह शासकीय है
- किसी को आवंटित नहीं की गई
- नामांतरण पूरी तरह अवैध है
- यहां तक कि धान की गिरदावरी भी चढ़ा दी गई, ताकि जमीन निजी स्वामित्व की दिखे
पटवारी निलंबित — एफआईआर की अनुशंसा, पर फाइल रुकी क्यों?
जांच रिपोर्ट में पटवारी राकेश साय, कैलाश जेठवानी और मधुसूदन अग्रवाल के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने की अनुशंसा की गई है। पटवारी को निलंबित भी कर दिया गया है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी बरकरार है—
एफआईआर की फाइल आखिर किसने दबा रखी है?
क्या भाजपा नेताओं की भूमिका अपने करीबी को बचाने में है?
सूत्रों का दावा — कई और प्रभावशाली लोग शामिल
सूत्र बताते हैं कि इस मामले में कुछ और भी रसूखदार लोग शामिल हैं, जिसके चलते कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पा रही। यह मामला बताता है कि जहाँ आम नागरिक अपनी ही जमीन के सीमांकन और नक्शा-बटांकन कराने में महीनों दफ्तरों के चक्कर काटते हैं, वहीं धनबल और राजनीतिक जोड़तोड़ के सहारे शासकीय जमीन भी चुटकियों में बेच दी जाती है।